मंगलवार, 9 जून 2020

झारखंड के वीर योद्धा,भगवान बिरसा मुंडा की 120 वीं पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन : प्रशांत सी बाजपेयी

प्रजा दत्त डबराल @ नई दिल्ली


      "अमर शहीद बिरसा मुंडा" जल-जंगल और जमीन की लड़ाई और आजादी  के महानायक आदिवासी समाज में नवचेतना के सूत्रधार झारखंड के वीर योद्धा,भगवान बिरसा मुंडा की 120 वीं पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन। 


प्रशांत सी बाजपेयी (अध्यक्ष, स्वतंत्रता आन्दोलन यादगार समिति) ने हमारे संवाददाता को बताया की आदिवासियों में भगवान के नाम से प्रसिद्ध बिरसा का जन्म 15 नवंबर 1875 को छोटा नागपुर पठारी इलाकों के जंंगलों में हुआ था। ये इलाका आज के झारखंड राज्य में अवस्थित है।  


हलांकि बिरसा का जन्म किसान परिवार में हुआ था, गरीबी के कारण बिरसा के माँ 'करमी' और पिता 'सुगना'जर्मन मिशनरियों के प्रभाव के कारण ईसाई धर्म अपना लिया था। अब छोटा बिरसा को विरासत मे मिसनरी स्कूल से पहले भेड़ चराने और बांसुरी बजाने के शौक ने दोस्तों के बीच लोकप्रिय लीडर बनाया, जिसने बिरसा मुंडा को अपने समाज और देश की समस्याओं के प्रति जागरूक कराना शुरू कर दिया था।



वैसै स्कूली शिक्षा पर मिशनरियों और वैष्णव प्रचारकों का प्रभाव रहा,जिसने बिरसा को जंगली जीवन के अलावा किसानों के अधिकारों का बोध दिलाया। बिरसा मुंडा ने मुंडा आदिवासियों के बीच अंग्रेजी सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया था, उस वक्त आदिवासी किसान जंगल पर अधिकार और झूम खेती पर सरकारी रोक के कारण परेशान थे। तब जंगल से एक खबर आग की तरह फैली कि भगवान स्वंय आकर बिरसा को तंत्र-मंत्र की शक्ति दे दी है।


लोग अपनी समस्याओं को लेकर जंगल की तरफ भागने लगे, यही वो समय जब बिरसा ने इसी अस्त्र से  आदिवासियों को अपने खेतिहर अधिकारों के प्रति जगाना शुरू कर दिया।तब अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें रोका और बिरसा को गिरफ्तार कर लिया। जेल से निकलने के बाद बिरसा ने धार्मिक उपदेशों के बहाने आदिवासियों में राजनीतिक चेतना फैलाने और सामाजिक कुरीतियां,धार्मिक अंधविश्वासों के कई मिथकों को तोड़ने का प्रयास किया।


ब्रिटिश सरकार के पुलिस अधिकारियों, क्रिश्चियन मिशनरियों, भूपतियों, सूदखोरों एवं भारतीय महाजनों के निर्मम अत्याचार के विरुद्ध बिरसा मुंडा ने 1895-1900 दिकू आंदोलन से सशस्त्र विद्बोह का बिगुल बजा दिया तब विद्रोह की चिंगारी फैल गई।उनका नारा था "अबुआ दिशोम ,अबुआ राज "(हमारे देश में, हमारा राज)बिरसा मुंडा और उनके आदिवासी साथियों के पास तीर-धनुष,कुल्हाड़ी और  भाला जैसी परंपरागत हथियार ही थे।


लेकिन बिरसा मुंडा व आदिवासी साथियों ने अंग्रेजों को अनेक लड़ाईयों में पराजित किया। आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध शुरु किया। लेकिन ब्रिटिश फौज ने आदिवासी आंदोलन का दमन शुरू कर दिया। सैकड़ो आदिवासियों ने शहादत दी। तब अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी पर 500 रुपए का इनाम रखा था।   


बिरसा मुंडा काफी समय तक तो पुलिस की पकड़ में‌ नहीं आया।लेकिन एक  स्थानीय  साहूकारों के गद्दारी के वजह से अंग्रेजों की विशाल सेना ने स्वतंत्रता संग्राम के इस जांबाज धरती पुत्र सिपाही को 3 फरवरी 1900 को बन्दी बना कर जेल भेज दिया। रांची जेल में असीम यातनाओं के बीच भूखे बिरसा हैजा- कोलरा जैसी गंभीर बीमारी के शिकार हो गये।  9 जून 1900  को बिरसा मुंडा जेल में ही वीरगति को प्राप्त हो गए।


'धरती आबा' यानी 'धरती पिता' भगवान बिरसा हमारी लोक परंपरा में, जनस्मृतियों में,आज भी जीवित हैं। जो अन्याय और शोषण के विरुद्ध आज भी हमें संघर्ष की प्रेरणा देते हैं ! आदिवासी जल-जंगल-जमीन संस्कृति,अस्मिता,स्वायत्तता के युवा जननायक "वीर बिरसा मुंडा" की पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन।