शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

"एक फूल गिर गगन से, ले सकता जब जान "कवयित्री कुसुम डबराल की कलम से...

कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता कुसुम डबराल की कलम से  :-


 


"एक फूल गिर गगन से, ले सकता जब जान" 


एक फूल गिर गगन से, ले सकता जब जान 
कैसे करती रोज वह, जीवित रह विष- पान l


लूट गयी हैं आँधिया, पत्ते फूल सुगंध 
रेत- रेत मन हो रहा, टूट गये बंधन l



बिछूड़े  अब दिल से किसी के,भीगे से है नैन
बरस - बरस कर थक गयी, 
पर मिला ना मन का चैन l


टूट -टूट कर गिर गये, देख किसीको  उदास.... 
फिर याद आ गया, 
आज तेरा प्यार l


हर झील से निशछल, एक कोमल फूल हू , रंग मे मिलने दो अपने...मै मीठी नीम सी हूं l 
 हर छन  तुझको जिन्दगी ही दूँगी 
रो  मत  पागल ! चल सम्भल  भर नयी उमंग l
कुछ टुटा, कुछ जुडा, सायद यही दुनिया का रंग ll