रविवार, 5 अप्रैल 2020

"तुंगनाथ के बाबा और तनु" प्रो.वीरेन्द्र सिंह नेगी की कलम से कहानी...

हिमालयी साहित्य खजाना श्रृंखला के अंतर्गत "तुंगनाथ के बाबा और तनु"  प्रो.वीरेन्द्र सिंह नेगी की कलम से कहानी...


"तुंगनाथ के बाबा और तनु"


          अब जीवन की सब इच्छाएं और स्पर्धाएं मन के भीतर पतीली पर बनते भात के उबाल सी नीचे बैठने लगी हैं। शायद विधाता अब आंच धीमी करने के लिए आधी जली लकड़ियों को चुहले से बाहर खींच रही है और उसे मेरे जन्म, जीवन की उत्पत्ति के मंतव्य से संतोष हो गया है। अब पहले जैसी दौड़-धूप और भागम-भाग छूटने लगे हैं। मन स्थिर, भूख कम, लौ मद्धम सी और सफर कुछ धीमा सा होने लगा है। हाथ सिराने के उपर और सिर के नीचे रखे लेटे लेटे आंखें बंद किए आज चोपता का ध्यान हुआ है।



इनके साथ एजुकेशनल टूर पर पहली बार साथ गई थी। संसार में सबसे ऊंचाई पर शिव भोलेनाथ का पवित्र स्थान तुंगनाथ और चंद्रशिला। सीधी चढ़ाई और अगल बगल के हरे मखमली घास के बुग्याल और चाय नाश्ता के ढाबे मेरी याद में आज तक ठंडी सिहरन का संचार कर देते हैं। इन्होंने कहा था। एक घंटे में रास्ता पूरा होगा। पर रुकते, बैठते, ठहरते, निहारते, चाय पीते और खाते यह दावा ग़लत साबित हुआ। कितनी बार मेरा हाथ पकड कर चलने के लिए खींचा था, और कितने बार मैंने हाथ छुड़ा कर इस शिव धाम रास्ते के सौंदर्य को मन में बसाने के लिए हाथ छुड़ाया। अंत में कैसे ये मेरा हाथ पकड़ कर मंदिर के पौराणिक परिसर तक ले गए थे। तीन घंटे से अधिक समय लग गया था चोपता सड़क  से मंदिर तक पहुंचने में। वहां पंहुच कर एक पत्थर पर बैठ आंखें बंद कर विश्राम करने के बाद आंखें खोली तो देखा ढोल की थाप पर सबसे बेखबर खूब नाच रहे थे।


जब नींद खुली तो इन्हें बताया कि इस बार तो भोलेशंकर रुद्रनाथ जी के दर्शन करके ही आयेंगे। अक्सर चुपचाप और किताबों में लीन रहने वाले इन्होंने मेरी तरफ मुस्कुराते हुए हामी भर दी।


इन पिछले सालों में जहां मन में एक शांति का वास होता दिख रहा है वहीं शरीर में कई विकार आ चले हैं। जोड़ों में दर्द, बीपी, तनाव, शुगर, गठिया, अनिद्रा और साथ में सुख सुविधाओं और सहूलियतों से रबड़ की तरह खींचा हुआ समय, जो अक्सर काटने को दौड़ता है। दीपु और रजनी भी आ रहें हैं। हम चारों के साथ मुन्नू लोग भी तैयार हो गए हैं। देहरादून से भी भैजि भाबि दोनों बेटियों को लेकर साथ आने की बोल रहे हैं। बाकी किसी को नहीं बताया। नहीं तो फिर जिम्मेदारी, काम, देख रेख और बाकी सारी औपचारिकताएं घर जैसे हो जायेंगी। 


सोच लिया है निर्विकार और निर्विरोध अंतर्मन में भक्ति भाव से महादेव के धाम जाना है। तब फिर याद आ गई पहली बार की जब ये मंदिर पंहुचे को व्याकुल थे और मैं अल्हड़ सी रास्ते के सौंदर्य में उलझी सी इन्हें जीवन में पाकर लौटी थी।



ऊखीमठ में रात बिताने के बाद सुबह नहा धोकर निकल पड़े चोपता की ओर। गाड़ी की खिड़की का शीशा नीचे कर बाहर सुंदर सड़क, हरे भरे ढलान, उन पर बसे खेतों व जंगलों से घिरे गांव और बहती नदी देख कर एक ताजगी की अनुभूति ने मन को शांति और प्रसन्नता से भर दिया। इन्होंने बातों बातों में सभी को बताया कि 3 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई और भरी  दोपहरी आसमान में सीधे सिर के उपर घूप में जाने की चुनौती है सबके सामने। इन्होंने यह भी बताया कि मैं अपनी गति से चलूंगा, बाकी सब आराम से अपने अपने हिसाब से चलते रहना। ठीक बीच रास्ते में जो मेरा पुराना परिचित ढाबे वाला  हैं मैं उससे सबके लिए खाना बनवा कर रखूंगा। 


मैंने मन में ठानी कि आज उपवास पर रहुंगी और शिव के दर्शन करूंगी। भोलेनाथ के नजदीक आते ही उनके दर्शनों की इच्छा प्रबल होती रही। हम सभी ने अपने अपने ढंग से चोपता सड़क से शिव मार्ग प्रारंभ होते यात्रा मार्ग पर बढ़े। पहले फोटो फोकस फिर सोलो और फिर सेल्फी। पुराने दिनों की यादें ताजा हो गई। कैसे हाथ पकड़ कर चली थी  ये अल्हड़ तनु। मन ही मन में मुस्कुरा दी। समय कैसे कुचांले मार भागता है। धीमे कदमों से चलते हुए आह भर मैं दीपू, रजनी, मुन्नू, सोना और राजी में अपना अल्हड़पन खोजने लगी। मुन्नू के मां-पिता, भाबि-भैजि और ये मेरे ख्यालों से बेखबर आगे चल रहे हैं। पांच सात मिनट में सांस  भर आई। आगे देखा सब चल रहे हैं। मुझे सबसे पीछे चलता देख सभी रुके। रास्ते के साइड में दिवार का सहारा लेकर मेरी प्रतीक्षा करते। पर मैं उन तक पहुंचूं वे आगे बढ़ने लगते।  हर 10 मिनट में यही सब होने लगा। मैंने उन्हें कहा कि आप लोग चलते रहो। मैं आती रहूंगी। मैं भी चाहती हूं कि सब निर्विकार, तनावमुक्त और निर्विरोध भाव से निश्चिंत होकर चलें। उन्हें मेरे चलते क्यों तनाव लेना पड़े। 


धीरे धीरे हमारे बीच का फासला बजने लगा और मैं पीछे छूटने लगी। थकान बढ़ने लगी। न जाने क्यों शिव भोलेनाथ भी दूर से लगने लगे। 


यह तीन किलोमीटर की चढ़ाई मुश्किल लगने लगी। उम्र के इस पड़ाव पर मेरी फिक्र करने और ध्यान रखने वाली इनकी दृष्टि भी औरों की जिम्मेदारी में बंट गई लगती है। सबके लिए खाने की तैयारी करने आगे पंहुच गए। एक घंटे बीतने पर भी मैं खाने वाले ढाबे तक न पंहुच पाई। मुझमें आगे बढ़ने का साहस क्षीण होता लगने लगा। बार बार रुक कर सारी सांस बटोर कर भी मेरे कदम मेरा साथ नही दे रहें हैं। अब तो दो कदम चल कर ही मुझे विश्राम लेना पड़ रहा है।  दूर तक देखने की भी हिम्मत न जुटा पा रही हुं। इतने में ये आते दिखे। इन्होंने बताया कि आगे ही अगले मोड़ पर  ढाबा है। वहां तक चलो, कुछ खाने के वहीं बाद आराम करेंगे।  बिना कुछ कहे मैं धीमे कदमों से उनके साथ चल पड़ी। ये बिना चले मेरे आगे आगे लगभग खड़े खड़े रहे। मुझे दिलासा देते कि आम आदमी क़ यहां से आधा घंटा, शहरी को पौना घंटा और मुझे एक घंटा लगेगा। आराम से चलेंगे। मुझे याद था कि उस बार ये मंदिर प्रांगण में  ढोल की थाप पर कितना नाचे थे। मैंने इनके  चेहरे पर अव्यक्त भीतर की बेचैनी को महसूस किया किया। आराम करते हुए मैंने इन्हें कहा कि आप चलो, मैं आती रहूंगी। निर्विकार, तनावमुक्त और निर्विरोध भाव से निश्चिंत यात्रा में इनको अपने साथ रोकना मुझे कचोट रहा है। इन्होंने मना किया और कहा कि साथ चलेंगे। मैंने कहा कि  आगे पंहुच कर सबको पूजा पाठ भी करानी होगी, आप बढ़िए। इस बार मेरा आग्रह टाल न सके।



बार बार मन में यही विचार आ रहा है कि पहले कैसे यह रास्ता पूरा किया होगा। कौन सी शक्ति तब मुझ में थी जो उम्र के साथ पीछे छूट गई। हां पर इतने वर्षों में मैंने अपने भीतर भोलेनाथ शिव में अटूट आस्था, श्रद्धा और भक्ति को जरूर सींचा है। सब यात्री, श्रद्धालु और राहगीर अपनी गति से मार्ग में चढ़ते-उतरते जा रहे हैं। पूरी हिम्मत बटोर कर मैंने फिर से चलना शुरू किया। दो कदम से अधिक चलना मुश्किल हो रहा है। यह तब है जबकि मैंने उपवास रखा और शरीर हल्का है। पैर कदम उठाए नहीं उठते, हे प्रभु क्या करूं? अब आगे जाना संभव नहीं। फिर से दीवार का सहारा लेकर खड़ी सोचने लगी। लंबी सांस भर  आकाश की ओर देख आंखें बंद किए अपनी सारी ताकत को समेटे फिर संभली। मन में विचार आया कि अकेले चलना इतना  मुश्किल है। आंखें बंद होने लगी। हे भगवान कैसी रचना की है इस जगत की?


बड़ी-बड़ी जटाएं और लंबी घनी दाढ़ी, हाथ में चिमटा, गले में मोटी मोटी मालाएं धारण किए बाबा ने मेरा हाथ थामा और बोले। बेटी इस जगत की माया बताता हुं। मैं उनका हाथ पकड़ कर सहजता से उनकी वाणी से बरसते अमृत वचनों को सुन चलने लगी।


ऊंचे ऊंचे पहाड़, बर्फीली चोटियां, घने जंगल, हरे भरे पहाड़ी ढलान, शोर करती हुई पहाड़ी नदियों का पानी, पशु पक्षी, आसमान, बादल, हवा, धूप और चंहुदिश फैले प्राकृतिक सौंदर्य की पूजा करने का इससे अधिक सुंदर स्थान धरती पर हो नहीं सकता। ब्रह्मा और विष्णु से रूठ कर  भागते बालक शिव को जब लगा कि  इस धरती को अपना घर बनाने का समय आ गया। तब शुरू हुई थी यह योजना।


और जब समस्त धरती, आकाश, पाताल समेत सारा ब्रह्मांड प्रलय की चपेट में आ गये तब काल रेखा के अज्ञात प्रारंभ को चिन्हित करने और अनादि अनंत का दायित्व निर्वहन के लिए उन्हें ब्रह्म के पुत्र के रूप में अवतरित तो कराया गया पर फिर कई युगों तक बिसार दिया गया। 



सदाशिव के संकेत व संकल्प से बढ़ते दैविक, सांसारिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान की शक्ति को संचालित करने के लिए विधान प्रेरक प्रकृति पराशक्ति का जननी स्वरुप अनन्य गतियों, अस्त्र शस्त्र, आशीर्वाद और भावों से सुसज्जित करने का कार्य भी महाकाल पर छोड़ दिया। फिर देवाधिदेव की अप्रतिम कृति और जीवन का सत्य निर्माण हुआ।।


सृष्टि की रचना में कालांतर और समांतर दोनों प्रकार निर्माण होता चला गया। देव, दानव, मनुष्य, प्रेत, किन्नर किन्नरियों और मौसमों ने अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए हमारे चारों तरफ की रचना कर डाली। उन्होंने अपनी इन बातों में सारा रास्ता काट दिया।


बेटी तुम्हारा कल्याण हो। भोलेनाथ शंकर भगवान सदा तुम्हे सुखी रखेंगे। मंदिर परिसर में पंहुच कर बाबा भीड़ में खो गए। मैं अपने उसी पत्थर पर आंखें बंद कर बैठ गई। देखती हूं कि ये सभी ढोल की थाप पर नाचने में मग्न हैं।


धीमे धीमे आंखें खोली, ढोल के नाच पर फेरा लेते इन्होंने मुझे देखा। दौड़ कर मेरी तरफ आए और यहां कैसे? तुम्हें जहां छोड़ कर आया हूं, वहां से चल कर अभी 2 मिनट पहले यहां पहुंचा। तुम इतनी जल्दी कैसे आ गई?


मैंने कहा आ गई, तुम्हारे सामने तो हूं। 
असंभव। यह हो ही नहीं सकता। तुम्हें किसी ने घोड़े पर छोड़ा है क्या?
नहीं भई, चल कर आई।


उन्हें बताया कि बड़ी-बड़ी छटाएं और लंबी घनी दाढ़ी, हाथ में चिमटा, गले में मोटी मोटी मालाएं धारण किए एख बाबा यहां तक छोड़ गए और आशीर्वाद भी दिया है कि बेटी तुम्हारा कल्याण हो। भोलेनाथ शंकर भगवान सदा तुम्हे सुखी रखेंगे।


भोंचक्के से आश्चर्य से भरे ये कभी मुझे देखते और कभी भोलेनाथ शिव तुंगनाथ मंदिर को। तब से इनके मन के भीतर के भाव पतीली पर बनते भात के उबाल सा नीचे बैठने का नाम नहीं ले रहा।


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