शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

उत्तराखण्ड का तिमला,स्वाद ही नहीं सेहत का खजाना भी...

रेनू डबराल  @ नई दिल्ली


      वैसे तो उत्तराखण्ड में बहुमूल्य जंगली फल बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं जिनको स्थानीय लोग, चरवाहे और पर्यटक बड़े चाव से खाते हैं।  ये सभी फल पौष्टिकता एवं औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इन्हीं में से एक फल तिमला है जिसको हिन्दी में अंजीर तथा अंग्रेजी में एलिफेंट फिग (Elephant Fig) के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम फाइकस आरीकुलेटा (Ficus auriculata) है, यह मोरेसी कुल का पौधा है। उत्तराखण्ड में तिमला समुद्रतल से 800-2000 मीटर ऊंचाई तक पाया जाता है। 


वास्तविक रूप में तिमले का फल, फल नहीं बल्कि एक उल्टा (इन्वरटेड) फूल है जिसका खिलना दिख नहीं पाता है। उत्तराखण्ड में तिमले का न तो उत्पादन किया जाता है और न ही खेती की जाती है।  यह कृषि वानिकी (एग्रो फोरेस्ट्री) के अन्तर्गत अथवा स्वतः ही खेतों की मेढ़ों पर उग जाता है जिसको बड़े चाव से खाया जाता है. इसकी पत्तियां बड़े आकर की होने के कारण पशुचारे के लिये बहुतायत में प्रयुक्त की जाती है। 


तिमला न केवल पौष्टिक एवं औषधीय महत्व का है अपितु पर्वतीय क्षेत्रों की पारिस्थितिकी में भी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है. कई सारे पक्षी तिमले के फल को खाते हैं तथा इसके बीज को एक जगह से दूसरी जगह फैलाने में सहायक बनते हैं।कई सारी कीट (Wasp) प्रजातियां भी तिमले के परागण में सहायक होती हैं। 


सम्पूर्ण विश्व में फाइकस जीनस के अन्तर्गत लगभग 800 प्रजातियां पायी जाती हैं. यह भारत, चीन, नेपाल, म्यांमार, भूटान, दक्षिणी अमेरिका, वियतनाम, इजिप्ट, ब्राजील, अल्जीरिया, टर्की तथा ईरान में पाया जाता है। 



पारम्परिक रूप से तिमले में कई शारीरिक विकारों को निवारण करने के लिये प्रयोग किया जाता है जैसे अतिसार, घाव भरने, हैजा तथा पीलिया जैसी गंभीर बीमारियों के रोकथाम हेतु. कई अध्ययनों के अनुसार तिमला का फल खाने से कई सारी बीमारियों के निवारण के साथ-साथ आवश्यक पोषक तत्वों की भी पूर्ति भी हो जाती है। 


इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ फार्मास्युटिकल साइंस रिव्यू रिसर्च (International Journal of Pharmaceutical Science Review Research) के अनुसार तिमला व्यावसायिक रूप से उत्पादित सेब तथा आम से भी बेहतर गुणवत्तायुक्त होता है. पोटेशियम का बेहतर स्रोत होने के कारण सोडियम के दुष्प्रभाव को कम कर रक्तचाप को नियंत्रित करता है। 


वेल्थ ऑफ़ इंडिया (Wealth of India) के एक अध्ययन के अनुसार तिमला में प्रोटीन 5.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेड 27.09 प्रतिशत, फाईवर 16.96 प्रतिशत, कैल्शियम 1.35, मैग्नीशियम 0.90, पोटेशियम 2.11 तथा फास्फोरस 0.28 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम तक पाए जाते हैं। 


पके हुये तिमले का फल ग्लूकोज, फ्रूकट्रोज तथा सुक्रोज का भी बेहतर स्रोत माना जाता है जिसमें वसा तथा कोलस्ट्रोल नहीं होता है. अन्य फलों की तुलना में फाइबर भी काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है. तिमले में फल के वजन के अनुपात में 50 प्रतिशत तक ग्लूकोज पाया जाता है, जो कैलरी का अच्छा स्रोत है। 


तिमला में विभिन्न पोषक तत्वों के साथ जीवाणुनाशक गुण युक्त फिनोलिक तत्व भी मौजूद होते हैं. इसमें प्रचुर मात्रा मौजूद एण्टीऑक्सिडेंट शरीर में टॉक्सिक फ्री रेडिकल्स को निष्क्रिय कर देता है. अपने इस गुण के कारण यह फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल एवं बेकरी उद्योग में कई सारे उत्पादों को बनाने में मुख्य अवयव के रूप में प्रयोग किया जाता है। पोखरा विश्वविद्यालय, नेपाल की 2009 में प्रकाशित रपट के अनुसार तिमला में एण्टीऑक्सिडेंट की मात्रा 84.088 प्रतिशत (0.1 मि0ग्रा0 प्रति मि.ली.) तक होती है। 


तिमला एक मौसमी फल है, इसी कारण उद्योगों में इसको सुखा कर लम्बे समय तक प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में तिमले का उपयोग सब्जी, जैम, जैली तथा फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल एवं बेकरी उद्योग में बहुतायत से किया जाता है। 


चीन में तिमले की ही एक प्रजाति ‘फाइकस करीका’ औद्योगिक रूप से उगायी जाती है तथा इसका फल बाजार में पिह के नाम से बेचा जाता है।  पारम्परिक रूप से चीन में हजारों वर्षो से तिमले का दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। 


2013 के एक अध्ययन के अनुसार विश्व भर में 1.1 मिलियन टन तिमले का उत्पादन पाया गया जिसमें सर्वाधिक टर्की 0.3, इजिप्ट 0.15, अल्जीरिया 0.12, मोरेक्को 0.1 तथा ईरान 0.08 मिलियन टन उत्पादन किया गया।  यदि उत्तराखण्ड में इन पौष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर, बहुत कम उपयोग में लाये जाने वाले, जंगली फलों हेतु मूल्य संवर्धन एवं मार्केट नेटवर्क उचित प्रकार से स्थापित कर फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल एवं बेकरी उद्योग के लिये बाजार उपलब्ध कराया जाय तो ये उपेक्षित जंगली फल प्रदेश की आर्थिकी एवं स्वरोजगार हेतु बेहतर विकल्प बन सकते हैं। 


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