रविवार, 3 मई 2020

"उधार का एक साल" प्रो.वीरेन्द्र सिंह नेगी की कलम से कहानी...

हिमालयी साहित्य खजाना श्रृंखला के अंतर्गत "उधार का एक साल"  प्रो.वीरेन्द्र सिंह नेगी की कलम से कहानी...


"उधार का एक साल"


धनसिंह को आज शहर जाना है। मां ने उसके लिए खाना पका दिया है। पिताजी सुबह ही गांव के साहूकार से उसके लिए शहर का खर्च लेने निकले पर अभी तक लौटे नहीं। शहर से गांव छुट्टी बिताने आए कुछ लोग अब गांव से वापसी को हैं। पिताजी ने मंगल चाचा से बात की है कि धन सिंह को साथ ले जाए और कहीं काम पर लगा दे। मंगल ने भरोसा दिलाया है कि बेटे को अपने साथ ही रखेगा और किसी न किसी काम पर लगा देगा। रहने और खाने पर सौ रुपए प्रति महीना का खर्चा आएगा। पिताजी को पता था कि दिल्ली में किसी प्रकार से आसानी से काम नहीं मिलता। दो चार महीने तो लग ही जायेंगे। इसलिए पैसे का बंदोबस्त करने सुबह से ही निकले हैं।


दो जोड़ी कपड़े और अपने चाचा, मामा और कुछ और कुछ रिश्तेदार जो दिल्ली में रहते हैं के लिए गांव-गांव की दाल की पोटलियां थैले में डाल कर धनसिंह तैयार हो गया। मां उसे समझा रही है कि किस किस को कैसे कहां अपनी ये सौगात देनी है। फिर मां ने उसकी पसंद की कांसे की  थाली में खाना परोस दिया। बचपन से उसने इस थाली में बड़े हक से खाना खाया है। 


पिताजी आ गए और बोले "पांच सौ रुपए मंगल को दे दिए हैं तू किसी बात की फिक्र मत करना"। 


"उनके साथ ही रहना और जो काम तेरे बस का हो उसमें लग जाना। पांच छह महीने तक चिंता की कोई बात नहीं।"


"जी पिता जी" रुआंसी मां की ओर देखते हुए उसने जवाब दिया।


"खाने-पीने की कमी मत करना" यह कहते हुए उन्होंने दो सौ रुपए धन सिंह को हाथ में पकड़ा दिए। 


मां ने अपने घर के भीतरखंड में देवता की टीका थाली में हल्दी चावल की पिठांई में जल मिलाकर बेटे को तिलक लगाकर विदा किया। पिताजी ने उसका थैला कंधे पर उठाया और आगे आगे निकल पड़े। 


"धनसिंह की मां! 
मैं इनको गांव से बाहर तक छोड कर आता हूं" वे बिना देखे आवाज लगा कर आगे बढ़ गये।


धनसिंह उनके पीछे पीछे चल कर मंगल चाचा और बाकी चारों लोगों से जा मिला। गांव के बाहर सड़क पर पंहुच कर पौड़ी की टैक्सी पकड कर वे 9 बजे की दिल्ली वाली गाड़ी के लिए निकल पड़े। धनसिंह ने से अपना थैला पकड़ने हाथ बढ़ाया तो  पिताजी बोले " मैं भी साथ आता हुं पौड़ी तक, कुछ सौदा खरीद लूंगा"। धनसिंह सब समझ रहा था। पिताजी उसके लिए खूब चिंतित हैं। मंगल के हाथ में धनसिंह की टिकट के पैसे देकर वे दूर जाकर खड़े हो गए।


दिल्ली की बस में बैठने पर उन्होंने बाकी सब के साथ धनसिंह को सीट मिलने की तसल्ली के बाद ही चैन लिया। पहली बार बेटे को शहर भेजने वाले पिता फिर एक बार गाड़ी में चढ़े।



"ये भी रख ले" जेब से एक सौ का नोट और निकालते हुए उसके हाथ पर रखते हूए वे बोले और गाड़ी से उतर गए। कातर निगाहों, नम आंखों और रूंधे गले से उसने आगे बढ़ती गाड़ी और पीछे हटते पिताजी को ओंझल होते देखा।


बुवाखाल धार से ठीक पहले धनसिंह ने पीछे मुड़कर एक बार फिर पौड़ी पर नजर डाली और गांव की धार और खेती बाड़ी सारी से मन ही मन बिदा ली। उसने समझ लिया था कि अब जो छूटा तो सब छूटा। उसके पिता जी ने आज उसे शहर भेजने के लिए आठ सौ रुपए उधार लिए थे। फिर बस पहाड़ी सड़क पर लहराते, झखोले मारती, रुकती, सवारियां चढ़ाती उतारती चल पडी  एक के बाद एक जगह घोड़ीखाल, परसुण्डखाल, पैडुल, अगरोड़ा, ज्वालपा, पाठसैण  होते हुए सतपुली आ गया। दोपहर के 12 बज गए। हल्का होने और खाना खाने लोग उतर पड़े। धनसिंह ने बस में बैठे रहना ठीक समझा। मंगल चाचा और अन्य के कहने पर वो अपने थैले को देखते सीट से उठा। 


"रखे रहने दे, कहीं नहीं जायेगा" उन्होंने बताया। वह  भी बस से नीचे उतरा। सब एक ढाबे पर गये। दाल भात, मूली खीरा, छोले और चटनी बहुत कुछ मंगाया गया। न चाहते हुए भी धनसिंह ने उनका साथ दिया। उसे ढाबे में खाने की आदत कहां थी। उसे अब मां के हाथ के बने खाने का फर्क पता लगा। मंगल चाचा ने खाने के पैसे चुका दिए। शायद पिता जी दे रखे हैं इसलिए। उसे मन पर थोड़ा बोझ पड़ता और थोड़ा हटता सा दिखाई दिया। मां बाप के साए से निकल किसी और पर आश्रित होने का यह अहसास उसके लिए बेहद असहज और तनाव से भरा हुआ था।


बस ने हॉर्न बजाया, वे दोबारा से बस में बैठ गये। सीट पर एक बुजुर्ग महिला बैठी है। अब क्या करें। बताया कि सीट हमारी है। पर एक और व्यक्ति ने कहा कि मां जी बुजुर्ग है, तुम मेरे साथ एडजस्ट कर लो। कोटद्वार में तेरी सीट तुझे मिल जायेगी। करता क्या है न करता, उसके साथ ही बैठना पड़ा।


बस के हिझकोले खाते गुमखाल से दुगडडा होते हुए कोटद्वार पंहुच कर पहाड़ हमेशा के लिए छूट गया। व  कभी बस से बाहर के खेत, जंगल, पहाड़, झरने देखता तो कभी झपकी लगते सपने में वापिस गांव पंहुच जाता। फिर किसी मोड़ पर बस की ब्रेक लगने से खुलती नींद से जाग से वापस गांव छोड़ चुकने के अहसास में लौट आता।



कोटद्वार में आधे घंटा रुकने के बाद केवल सड़क, बस सवारियां, दौड़ते खेत, खुला आसमान बड़े बड़े कस्बे और गर्म हवा से उसका साक्षात्कार हुआ। रास्ते में चाय नाश्ता और भरपूर नींद के बाद देर रात एक जगमगाते शहर में उसकी आंख खुली। बस के बाहर लगातार गाडियां और उनका शोर, सड़क पर भीड़, दोनों ओर ऊंची ऊंची बिल्डिंगें देख कर उसकी आंखें चौंधिया गई। बारह चौदह घंटों में वह अपना घर, गांव, बाटा, नाता, हवा, खेत और जंगल सब पीछे छोड़ आया। रात 11 बजे पडपडगंज उतर कर आधा घंटा पैदल चल कर गलियों से होते हुए वे सब कोटला पंहुच गए। तीसरी मंजिल पर एक दरवाजे पर पंहुच कर वे अंदर घुस गए। दो कमरे एक बरामदा, रसोई और बालकनी, सब ओर सामान का ढेर। दो लोग पहले से ही वहां थे। अब कुल मिलाकर सात हो गए। उन्होंने उनके लिए चावल दाल बना कर रखा था। जल्दी जल्दी कपड़े बदलकर मुंह हाथ धोकर सबने खाना खाया। धनसिंह के लिए यह भी जीवन का नया अध्याय सा था। सबने अपनी अपनी थाली धोकर रख दी। वह अंत में खाकर उठा, तो उसे ही बाकी सब बर्तन भी धोने पड़ें।


"अब सो जा बेटा" मंगल चाचा ने बिस्तर पर लेटते हुए कहा। 


"अच्छा" जवाब देकर उसने इधर उधर नजर दौड़ाई। सोने के लिए उसे कोई जगह दिखाई नहीं दी। वह आसपास देखते हुए बरामदे से होते हुए दुसरे कमरे और फिर बालकनी में पंहुचा। थोड़ी देर बाद बीड़ियां सुलगा इधर उधर की बातें कर सब अपनी अपनी जगह लेकर सो गए। अपरिचित घर में किसी जगह को अपने सोने लेटने में धनसिंह को बेहद मुश्किल हुई। घर गांव को याद करते हुएउसने बालकनी में चटाई बिछाकर पहली रात बिताई।


दिल्ली का सफर कुछ हटकर है। उसने सुना था यहां पर जीना हो तो यहां के ट्रैफिक यहां के गोल चक्कर यहां के चौराहों और चौड़ी सड़कों से जान पहचान जरूरी है। सुबह उठकर लाइन में लगना और दिन भर एक लाइन पकड़ कर चलना मुड़ना घूमना और वापस लौटना। दिल्ली मैं जिंदगी एक लाइन से होकर रह जाती है। कई दिनों तक धनसिंह अपनी चार मंजिला बिल्डिंग और इसके आसपास की सड़कों की लंबाई, चौड़ाई और मोड़ नापता रहा। मंगल चाचा अभी तक कोई काम ढूंढ न पाए। इस बीच चाचा, मामा, दूर के भाई और जिन जिन के लिए मां ने दाल की थैलियां भेजी थी वे भी मिलने आए पर काम का कोई ठिकाना नहीं हो रहा है। धनसिंह एक नई जिंदगी में प्रवेश कर रहा है। यहां एक वक्त का खाना और रात को चटाई पर एक चादर लेकर सोना भी बड़े भाग्य की बात है। 


धनसिंह कभी कभी जान पहचान वालों के साथ घूमने भी जाया करता। उसको आईटीओ, भजनपुरा, आरके पुरम, महरौली और बस अड्डे जैसे स्थान का भी पता लग गया था। पर उसे काम या नौकरी अभी तक दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही है।


एक शाम शुक्रवार को मंगल चाचा ने बताया की कल शनिवार गांव के लोगों की मीटिंग होगी। करीब बीस बाइस लोग आएंगे। दोपहर का खाना खाकर जायेंगे। बस पहाड़ से पलायन किए लोगों का जमावड़ा लगेगा। धनसिंह ने उस दिन अलग अलग जगह काम करने वाले अपने गांव के लोगों को मिलकर समझा कि कैसे कैसे ये सब यहां अपना भविष्य निर्माण करने यहां आ कर संघर्ष कर रहे हैं। पहाड़गंज के होटल में मेहनत, स्कूल में बाबू, गृह मंत्रालय में ड्राईवर,  सिनेमा हाल में, राष्ट्रपति भवन में, डीटीसी, रेलवे कालोनी, सेवा भवन, आईबी, पुलिस हेडक्वार्टर, दिल्ली केंट और न जाने कहां कहां नहीं। हर एक ने एक से बढ़कर एक बातें की। धनसिंह ने देखा कि मीटिंग में सब मिलकर कमेटी डाल कर धन संग्रह कर अपने संघर्ष और उम्मीद का बड़ा अच्छा उपाय करते हैं। सिगरेट, बीड़ी, शराब, जुआ, मांस-मछली, धुंए, गाली गलौज झगड़े व  दाल भात से पूरा हुआ दिन उसके लिए शहर के जीवन का एक नया आयाम था। महेन्द्र भाई ने उसे बुलाया और पूछा। "कुछ काम धाम कर रहा है कि नहीं"।



"अभी तो नहीं, मंगल चाचा देख रहे हैं" उसने बताया।


"तू आज मेरे साथ दिल्ली कैंट चल" महेंद्र भाई ने कहा।


"मंगल चाचा से पूछ कर बताता हूं"। उसने कुछ असहज होकर कहा। 


महेन्द्र ने पी रखी थी, उसे समझ नहीं आया कि कहीं यह दारू की झांझ में तो नहीं बोल रहा। पर महेंद्र ने देर न करते हुए मंगल चाचा को बताया और धनसिंह को साथ लेकर जाने की मंजूरी दे ली।


अगले दिन महेंद्र धनसिंह को लेकर धौला कुआं अपने ऑफिस गया। वहां एक बड़ा सेमिनार या कॉन्फ्रेंस चल रही थी। उसने बताया कि तीन दिन के इस प्रोग्राम में सुबह आठ बजे से रात सात बजे तक रुकने का काम है। सामान अंदर रखवा ने और कुछ छोटे-मोटे काम में हेल्पर की जरूरत के लिए तुम्हें यहां लगना होगा। बारह रुपए दिन के हिसाब से और खाना पीना फ्री रहेगा। धनसिंह के पास कोई जवाब नहीं था, उसने हामी भर दी। गांव से निकलने के बाद एक महीने बाद धन सिंह को तीन वक्त भरपेट भोजन मिला और तीनों दिन सोने के लिए चारपाई बिस्तर और ओढ़ने की चादर भी मिली। टिप्स वगैरा मिलाकर उसे कुल पचास रुपए मिले। अपने जीवन की पहली कमाई के इन पैसों को हाथ में पाकर धनसिंह ने पिताजी खूब को याद किया। उसे फिर याद आया कि कैसे पिताजी उसके आने वाले दिन आठ सौ रुपए उधार लेकर आए थे। अगले दिन धनसिंह मंगल चाचा के पास लौट आया। कुछ दिनों तक फिर वही पुरानी दिनचर्या रही। एक दिन मंगल चाचा जी उसे कहा कि कल सुबह साथ चलना है। चाचा उसे लेकर लोधी रोड गए वहां उसे एक प्रिंटिंग प्रेस वाले ने ढाई सौ रूपए महीने पर काम पर रख लिया। महीने भर काम सीखने के बाद तनख्वाह बढ़ाने की बात भी हुई। गांव से आए उसे दो महीने होने वाले थे। धनसिंह अब सप्ताह में छह दिन नौकरी पर जाने लगा।


दो महीने काम करने के बाद उसने थोड़ा  सा धनबल जोड़ना शुरू किया। महीने में साठ पैंसठ रूपए बस का किराया लग जाता। नाश्ता और दिन का खाने में भी उसका इतना ही खर्च हो जाता। पिताजी की दी हुई तीन सौ रूपए की सौगात उसके पास हमेशा रही। बाकी बचे पैसों से उसने अपने लिए कपड़े जूते खरीद ख़रीदे और गांव के लोगों की धन संग्रह मीटिंग में भी पचास रुपए महीने का भागीदार बन गया। मंगल चाचा को पिताजी ने पांच छह महीने तक उसे साथ रखने को कहा हुआ था। चार महीने पूरे होते एक दिन धन सिंह ने मंगल चाचा को बताया कि कोटला मुबारकपुर में ही किराए का कमरा देख रहा हूं। आने जाने का समय काफी लगता है। उसने यह नहीं कहा कि यहां सोने का काफी कष्ट है। यह बात मंगल चाचा को खुद ही पता थी उन्होंने हामी भर दी। धनसिंह ने लोधी रोड के आसपास साउथ एक्सटेंशन कोटला मुबारकपुर में तीस रुपए महीने में कमरा खोज लिया। वह स्टोब, बर्तन, मसाला, चाय आटा दाल चावल और खाने पीने का बाकी समान भी खरीद लाया। अपना कमरा ठीक कर ने के बाद भी वह पांच छह दिन तक मंगल चाचा के पास ही आता रहा। शहर के जीवन में कदम रखने और सहारा देने वाले मंगल चाचा को उसने अपने दिल में हमेशा के लिए खास स्थान दिया।


नौकरी पर लगने के बाद नई जिंदगी में कदम रखने पर धनसिंह ने खुद को दिल्ली में जमाना शुरू किया। प्रेस वाले  मालिक ने छह महीने तक उसे ढाई सौ रूपए महीने पर ही नौकरी पर रखा। उसके लिए यह ज्यादा दिक्कत की बात नहीं थी। अब वो खुद खाना बनाने, कपड़े धोने के साथ पानी की बाल्टी, घड़ा, फोल्डिंग चारपाई, बिस्तर, कंबल गर्म कपड़े और लोहे की अलमारी सब जोड लिया। उसे गांव छोड़े दस महीने हो गए। पचास रुपए तनख्वाह भी बढ़ गई। मिटिंग में धन संग्रह भागीदारी के पैसे देकर भी वह महीने के सौ डेढ सौ रुपए बचाने लगा। उसके पास हजार रुपए से अधिक जमा हो गए हैं। गर्मियां फिर से दस्तक दे रही है, और हर पहाड़ी की तरह उसके गांव की आज उसके दिल का दरवाजा खटखटा रही है। उसने मालिक को बता दिया कि वह एक हफ्ते के लिए छुट्टी लेकर गांव जायेगा।


पूरा एक साल उसे गांव से निकले हो गया और आप उसके पास पिताजी के दिए तीन सौ रूपए की सौगात को जोड़ कर दो हजार रुपए जमा हो चुके हैं। उसने कोटला बाजार से घर के लिए चायपत्ती, दाल, मसाला, नमकीन, ड्राई फ्रूट्स, मिठाई, संदूक, मां के लिए धोती, पिताजी के लिए पैंट, स्वेटर, जुराब,जूते, चप्पल, हुक्का, तम्बाकू ख़रीद कर जमा कर लिया। फिर एक बैग और एक संदूक खरीद कर सब सामान बांध लिया। उसने पिताजी के लिए दो बोतल और मांजी के लिए सोहन हलवा भी खरीद लिया। पहली बार एक साथ दो ढाई सौ रूपए की खरीददारी कर वह खुद को बड़ा महसूस कर रहा था। 



सेवानगर से दिल्ली कोटद्वार की चोरबस में उसने टिकट बुक करा ली। शुक्रवार शाम चार बजे सेवानगर से बस में बैठ कर रात ग्यारह बजे तक  दिल्ली के अलग अलग हिस्सों से सवारियां लेते हुए गांव के लिए निकल पड़ा। सुबह पांच बजे कोटद्वार से पौड़ी की बस पकड़ कर धनसिंह फिर पहाड़ की चढ़ाई वाली सड़क पकड़ कर गांव  जाने की जल्दी में था। शाम चार बजे बस पौड़ी बस स्टैंड पंहुच गई। पिताजी कंधे पर थैला टांगे और हाथ में छाता लिए उसका इंतज़ार कर रहे हैं। उसे लगा जैसे एक साल से वहीं ठहर कर उसका इन्तज़ार कर रहे हों। उन्होंने टैक्सी वाले से दो सीट रोक कर सड़क के किनारे ठहराया हुआ था। पिताजी के कहने पर टैक्सी ड्राइवर ने संदूक  उठाकर अंदर रखा और चल पड़े गांव की ओर। शाम ढलने लगी थी। पिताजी और धनसिंह सड़क से  गांव के टेढ़े मेढे रास्ते से घर पंहुच गए। मां घर के बाहर इंतजार में खड़ी है। लालटेन और दीए की लौ ने घर को रौशन कर दिया। वह मुंह हाथ धोकर कपड़े बदल कर अपने कमरे में घुस कर अपने बिस्तर पर गिर पड़ा। एक साल बाद अपनी खुशबु से मिल कर वह खुब रोया। मां ने चाय बना दी। पिताजी उसका संदूक और बैग उसके कमरे में सरकाने लगे तो उसने मना कर दिया।


"ये लो" चाबी पिताजी को देते हुए उसने कहा।
"तुम यह बैग खोलो, खाण पीणे का सामान है, खाली करो" उसने मां जी को कहा।


उसके चाय पीते पीते सारा सामान खुल कर सामने पड़ा है। मां जी और पिताजी कभी  धनसिंह को और कभी सामान को देखते हुए अपने बेटे पर  निहाल हो रहे हैं। मां ने खाने की हर चीज से एक एक टुकड़ा निकाल कर तस्तरी में रखा और भीतरखंड देवता को चढ़ाया। चाय का कप नीचे रख धनसिंह ने पिताजी के हाथ में हजार रुपए रख दिए। उसे याद है कि पिछली बार पिताजी ने उसे दिल्ली भेजने के लिए आठ सौ रूपए का उधार किया था। मां को दो सौ रुपए देकर वह रसोई की ओर बढ़ गया। जहां उसकी पसंदीदा कांसे की थाली चमक कर उसका स्वागत कर रही है।


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